मोहनी मोहन सों रसखानि

Raskhan Ratnavali — श्री रसखान

Verse 20 of 39

(सवैया) लाड़िली लाल लसै लखिए, अलि पुंजन कुंजनि में छवि गाढ़ी। ऊजरी ज्यो बिजुरी सी जुरी, चहुँ गूजरी केलि कला सम काढी॥ [1] त्यों रसखान न जानि परै, सुखमा तिहुँ लोकनि की अति बाढ़ी। लालन बाल लिये बिहरै, छहरै सिर मोरपखी ठग ठाढ़ी॥ [2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली (सवैया) लाड़िली लाल लसाई लखी, पुंजन कुंजनि में अली रची छवि। उजरी जैसी, बिजुरी जैसी, ज्यूरी जैसी, हर दिशा में कला ही कला है.. [1] खाना कोई नहीं जानता, पर खुश रहने वाले के लिए बहुत खराब है। जब सखियों की टोली में लाड़िली-लाल (राधा-कृष्ण) की छवि दिखाई देती है तो अपार सौन्दर्य फैल जाता है। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उसका सौन्दर्य तेज बिजली की तरह चमक रहा हो और चारों ओर गूँज रहा प्रेम प्रसंग मानसिक कलात्मकता के शिखर को छू रहा हो। [1]
मोहनी मोहन सों रसखानिमोहनी मोहन सों रसखानि