मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 2 of 39
(सवैया)
अंग ही अंग जड़ाऊ जड़े, अरु सीस बनी पगिया जरतारी।
मोतिन माल हिये लटकै, लटुबा लटकै लट घूँघर वारी॥ [1]
पूरब पुन्य तें ‘रसखानि’ ये माधुरी मूरति आय निहारी।
चारो दिशा की महा अघनाशक, झाँकी झरोखन बाँके बिहारी॥ [2]
- श्री रसखान जी, रसखान रत्नावली
(सवैया) शरीर के हर हिस्से में जड़ें होती हैं, और ऐसे पन्ने बनाना जरूरी है। मोतिन माल ही हांगी, लटुबा हांगी लत घुंघर वारी.. [1] पूरब पुण्य तीन 'रसखानि' ये माधुरी मुराती ऐ निहारी। सब दिशाओं के महाविनाशक, झांकी झरोखे वाले बिहारी.. [2] - श्री रसखान जी, रसखान रत्नावली