मोहनी मोहन सों रसखानि

Raskhan Ratnavali — श्री रसखान

Verse 23 of 39

(सवैया) मंजु मनोहर मूरी लखै तबहीं सबहीं पतहीं तज दीनी। प्रान पखेरू परे तलफ़ैं वह रूप के जाल में आस अधीनी॥ [1] आँख सौं आँख लड़ी जबहीं तब सें ये रहैं अँसुवा रँगभीनी। या रसखानि अधीन भई सब गोपाल की तजि लाज नवीनी॥ [2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली (सवैया) मंजु मनोहर मूरि लखै तबहि सबहि पताहिं तज दीनी। प्राण पखेरु पारे तलफैन वाह रूप जल पुरुष अस अधिनि.. [1] अँख सौं अँख लड़ी जब भी तब सेन ये रहे अंसुवा रंगभिनि। या रसखानि के आधीन भई, सब गोपाल तजि लाज नई। [2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली।
मोहनी मोहन सों रसखानिमोहनी मोहन सों रसखानि