मोहनी मोहन सों रसखानि

Raskhan Ratnavali — श्री रसखान

Verse 24 of 39

(सवैया) मेरो सुभाव चितैबे को माई री, लाल निहार के बंसी बजाई। [1] वा दिन तें मोहि लागी ठगौरी सी, लोग कहें कोई बावरी आई॥ [2] यों रसखानि घिरयौ सिगरो ब्रज, जानत वे कि मेरो जियराई। [3] जो कोऊ चाहो भलो अपनौ तौ, सनेह न काहूसों कीजौ री माई॥ [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली (सवैया) मधुर प्रियतमा, लाल नेत्रों से बजती है बांसुरी। [1] इन दिनों दस मोही ठग जैसा हो गया है, लोग कहां हैं? [2] तुम यूँ सिगार पी रहे हो, तुम जानते हो ब्रज, तुम मेरे प्रेमी हो। [3] जो चाहो करो, अपने आप से प्रेम करो, किसी से प्रेम मत कहो.. [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली
मोहनी मोहन सों रसखानिमोहनी मोहन सों रसखानि