मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 25 of 39
(सवैया)
मोहनी मोहन सों रसखानि, अचानक भेंट भई बन माँही।
जेठ की घाम भई सुख धाम, आनंद हौं अंग ही अंग समाही॥ [1]
जीवन को फल पायो भटू रस, बातन केलि सों तोरत नाहीं।
कान्ह को हाथ कन्धा पर है मुख, ऊपर मोर किरीट की छाँही॥ [2]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) मोहनी मोहन सो रसखानी, भाई अचानक मिलना संभव नहीं। जीजा की शान सुख का धाम है, सुख ही उसका कण-कण है.. [1] जीवन का फल पाओ, भातु रस, केवल शब्दों का नहीं, बेटा। कंधे पर हाथ, कान पर मुंह, ऊपर मोर मुकुट.. [2] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली