मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 28 of 39
(सवैया)
नैन लख्यो जब कुंजन तैं, बनि कै निकस्यो मटक्यो री। [1]
सोहत कैसे हरा टटकौ, सिर तैसो किरीट लसै लटक्यो री॥ [2]
को 'रसखान’ कहै अटक्यो, हटक्यो ब्रजलोग फिरैं भटक्यो री। [3]
रूप अनूपम वा नट को, हियरे अटक्यो, अटक्यो, अटक्यो री॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) नैन लाख्यो जब कुंजन तै, बानी कै निकस्यो मटक्यो री। [1] कैसे हारे प्राण, क्यों ऐसे लटकाया अपना मुकुट.. [2] कहते हैं रसखाना, फिर क्यों छोड़ दिया ब्रजवासियों को भटकने के लिए। [3] रूप अनुपम वा नट को, हयारे अटक्यो, अटक्यो, अटक्यो री.. [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली