मोहनी मोहन सों रसखानि

Raskhan Ratnavali — श्री रसखान

Verse 29 of 39

नन्द महर कै बगर तन, ऊब मेरे को जाय। नाहक कहुं गढ़ि जायगो, हित काँटो मन पाय॥ - श्री रसखान, रसखान रत्नावली प्रियतम के प्रेम के बिना यह शरीर मुझसे दूर हो जाएगा। मैं क्या कहूँ, आगे बढ़ो, जो मन में हो वही करो.. - श्री रसखान, रसखान रत्नावली
मोहनी मोहन सों रसखानिमोहनी मोहन सों रसखानि