मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 30 of 39
(सवैया)
फागुन लाग्यौ सखी जब तें, तब ते ब्रजमण्डल धूम मच्यौ है। [1]
नारी नवेली बचै नहि एक, बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है॥ [2]
साँझ सकारे वही रसखानि, सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है। [3]
को सजनी निलजी न भई ,अब कौन भटू जिहि मान बच्यौ है॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) फागुन सखा जब डालोगे, तो ब्रजमंडल में हलचल मचाओगे। [1] नवविवाहिता का कोई नहीं बचा, यहां सब प्यार खास.. [2] शाम को वही जूस हाउस, गुलाल से सुरंग। [3] को सजनि नीलाजी न भाई, अब कौन भातु जिहि मन बचायौ.. [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली