मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 31 of 39
(सवैया)
रंग भर्यौ मुसकात लला, निकस्यौ कल कुंजन ते सुखदाई। [1]
मैं तबही घर ते निकसी, तकि नैन विशाल की चोट चलाई॥ [2]
रसखान सों घूमि गिरी धरनी , हरिनी जिमि बान लगे गिर जाई। [3]
टूटि गयो घर को सब बन्धन , छूटिगो आरज लाज बड़ाई॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) रंग भरयौ मुस्कुराओ लाला, निकसायु कल कुंजन ते सुखदाई। [1] मैं तुरंत घर से बाहर भागा, ताकि विशाल की आँखों को चोट न लगे.. [2] रसखान के कारण पृथ्वी गायब हो गई, हिरण जम कर गिरने लगे। [3] टूटे घर के सब बंधन, गये अभिमान लज्जा.. [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली