मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 32 of 39
(सवैया)
संपति सौं सकुचाई कुबेरहि, रूप सौं दीनी चिनौति अनंगहि। [1]
भोग कै कै ललचाई पुरन्दर, जोग कै गंगलई धर मंगहि॥ [2]
ऐसे भए तौ कहा ‘रसखानि’, रसै रसना जौ जु मुक्ति तरंगहि। [3]
दै चित ताके न रंग रच्यौ, जु रह्यौ रचि राधिका रानी के रंगहि॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) स्नपति सौं सौक्छाइ कुबेरहि, रूप सौं दीनि चिनोति अनंगहि। [1] भोग का मोह महान है, योग की मांग बुरी है.. [2] यदि ऐसा है तो आपने कहा 'रसखानि', रस ही मोक्ष का स्रोत है। [3].