मोहनी मोहन सों रसखानि
Raskhan Ratnavali — श्री रसखान
Verse 8 of 39
(सवैया)
द्रोपदी औ गणिका हू अजामिल, शोक हर्यो जब नेक निहारो। [1]
गौतमनारी तरी ध्रुव औ, प्रह्लादको दुक्ख हर्यो अति भारो॥ [2]
काहे को सोच करै 'रसखान', कहा करि है जमराज बिचारो। [3]
कौन सी शंक परी है जो, माखन चाखन हारो है राखनहारो॥ [4]
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
(सवैया) द्रौपदी और वेश्या अमर हैं, कुलीन को देखकर दुःख मिट जाता है। [1] गौतम की पत्नी ध्रुव और प्रह्लाद का दुःख अति शीघ्र है। [2] जमराज कहते हैं बेचारे 'रसखान' क्यों सोचें? [3] वह कौन सी शंख परी है जिसने माखन का स्वाद खो दिया है... [4] - श्री रसखान, रसखान रत्नावली