लटकत आावत बाहाँ जोरी

Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि

Verse 16 of 19

रंग भरी राजत अलकलड़ी री। ललिता ललित लिये जल झारी, ध्यावत सुन्दर वदन खड़ी री। [1] प्रेम फलक दीपत अंग अंगनि, पिय के नव-नव-लाड़ लड़ी री॥ अलबेलीअलि छकनि छकी प्रियतम नयनन माँझ गड़ी री॥ [2] - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (66) रंगीन चाँदी क्षार. पानी बह रहा था, ललिता ठीक थी और सुंदर पानी खड़ा था। [1].
लटकत आावत बाहाँ जोरीरुनकि-झुनकि आवति कुंजनि तैं