लटकत आावत बाहाँ जोरी
Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि
Verse 2 of 19
आरति करत श्री ललित कुँवरि की।
कोटि भानु दुति रूप सुंदरि की॥ [1]
राजत कनक सिंहासन स्यामा।
अद्भुत रूप अनूपऽभिरामा॥ [2]
सारंगी बीन प्रबीन बजावैं।
पदगति नूपुर सुरनि मिलावैं॥ [3]
प्रेम मुदित अलि चँवर दुरावैं।
जय जय शब्द पुहुप बरसावैं॥ [4]
अङ्गनि दुति फैली बन जोती।
पत्र फूल मनों कुन्दन दोती॥ [5]
निरषि निरषि अँग अङ्ग निकाई।
अलबेली अलि बलि बलि जाई॥ [6]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (115)
श्री ललित कुँवरि की आरती करें। कोटि भानु दत्ति रूप सुन्दर सुन्दरी। [1] रजत कनक सिंहासन श्यामा। अद्भुत रूप अनुपभिराम..[2] प्रबीन के बिना सारंगी बजाई। पद्गति नूपुर सुरानी मिलावैं..[3] प्रेम मुदित अली चंवर दुरवैन। जय जय शब्द पुहुप बरसावैं।।[4] अंगगणि दुति फेलि बन जोति। पत्र पूर्ण मनोन कुन्दन दोति.. [5] निराशा निराशा देह अंग देह। अलबेली अली बाली बाली जय.. [6] - श्री अलबेली अली, समय प्रबंधन (115)