लटकत आावत बाहाँ जोरी
Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि
Verse 3 of 19
बड़े बड़े नयन अरुण रत्नारे।
छकनि छके रसमत्त उनींदे, नींदर घूम-घुमारे॥ [1]
सुंदर इन्दु बदन अंबुज पर, दीपत रूप उजारे।
अलबेलीअलि फिरै चपल गति, चंचल मद मतवारे॥ [2]
- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (68)
बड़ी-बड़ी आंखें अरुण रत्नारे. मधुर स्वप्न चमक रहे थे, निर्भय करवटें... [1] आँखों पर इंदु का सुन्दर शरीर चमक रहा था, उसका दीप्तिमान रूप चमक रहा था। अलबेलियाली घुमक्कड़ी, चंचल चाल, चंचल मिजाज.. [2] - श्री अलबेलिया अली, समय प्रबंधन (68)