गुंजन मधुपन सुनत अलींरी

Samay Prabandha — श्री अलबेली अलि

Verse 7 of 19

(राग भैरव) गुंजन मधुपन सुनत अलींरी। उमगीं मनौं प्रेम की सरिता, रूप के सिंधु चलींरी॥ [1] विहँसत बदन हँसत विगसत-सी, जनु अनुराग कलींरी। रूप अनूप लखें अलबेली, आई वारि भलींरी॥ [2] - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (22) (राग भैरव) गुंजन मधुपं सुनत आलिन्री। प्रेम की बहती धारा, सौन्दर्य का सिन्धु... [1] हँसी से भरा शरीर, वही प्रेम का सौन्दर्य है। रूप अनुप लाखें अलबेली, ऐ वारी भालिनारी.. [2] - श्री अलबेली अली, समय प्रबंधन (22)
लटकत आावत बाहाँ जोरीलटकत आावत बाहाँ जोरी