जुग मुख छवि बरनी
Saras Dev Vani — श्री सरस देव
Verse 2 of 5
(राग सारंग)
जुग मुख छबि बरनी न परै री।
उपजत मैन परस्पर बैननि नैंननि में मुसकात हरे री॥ [1]
अंस भुजा दीने भीने रंग रहसि बहसि हँसि अंक भरै री।
विवस भये विहरत पिय प्यारी, सरसदास उर संचि धरै री॥ [2]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)
(राग सारंगा) जुग मुख चाभी बरनी न पराई री। उपजात में एक दूसरे की आंखों में मुस्कान है.. [1] उत्तर भुज देने भी रंग रहसी बासी हांसी नंबर भराई री। विवस भये विहार पिया प्यारी, सरसदास उर स्नचि धरै री.. [2] - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (16)