आजु अति राजति नागरी नाहु
Saras Sagara —
Verse 4 of 6
(राग देव गंधार)
आजु अति राजति नागरी नाहु।
बन घन कुंज कुंज प्रति बोलत अंसन पर धर बाहु॥ [1]
फूली लता परसि रस हँसि भरे गावत अधिक उछाहु।
मंद मंद गति अति छवि उपजत निरखि सखी बलि जाहु॥ [2]
आनंद मगन भये लटकत नट पट भूषन तन जाहु।
सरसदास सुख रासि लाड़िली लालन संग किलकाहु॥ [3]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के पद (5)
(राग देव गंधार) अजू अति राजति नागरी। बन घन कुंज कुंज प्रति बोलत अंसन पर धर धर बहु.. [1] पुष्प लता परसी रस गावत भारी हँसी मोर उछौ। मन्द मन्द गति अति छवि उपजत निरखि सखी बलि जाहु।।[2] आनंद मगन भये लटकत नट पट भूषण तन जाहु। सरसदास सुख रसि लड़ै ललन संग किलकाहू।।[3] - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सरस विहार रस के छंद (5)