जय जय श्री ललिता ललित

Shri Lalita Mngala — श्री वंशी अलि

Verse 4 of 5

मंजीर मंडित चरण पंकज चंद्र नष जगमगि रहै। [1] राधा कृपा हित नंद-नंदन भक्त भावित नित गहै॥ [2] जा रेणु वर कन पवन सौं नित कोटि विष्णु भव तलं। [3] नारदेश शुकादि दुर्गम महा दीरघ तत्फलं॥ [4] - श्री वंशी अलि, श्री ललिता मंगल (5) मंजीर दिमित चरण पंकज चंद्रनाश चमक रहे हैं। [1] राधा की कृपा नित नन्द-नन्दन भक्त के भावों पर वार करती है.. [2] जा रेनु वर कन पवन सौं नित कोटि विष्णु भव तलन। [3] नरदेश शुकादि दुर्गा मह दीर्घ तत्फलं.. [4] - श्री वंशी अली, श्री ललिता मंगल (5)
जय जय श्री ललिता ललितजय जय श्री ललिता ललित