मैं जानी मैं जानी लडैती जू
Shringar Ras Ke Pada —
Verse 10 of 35
लड़ैती जू की साहिबी अटल बनी।
याही के सुख में सुख पावत, सुंदर स्याम धनी॥ [1]
छिन छिन नई नई प्रीति करत अति, कापै परत गनी।
श्री हरिदासी के संग विलसत, कुंज केलि अपनी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (105)
अटल बानी, एक योद्धा की पत्नी. याहि के सुख पुरुष सुख पावत, सुंदर स्याम धनी.. [1] छिन छिन न नै प्रीति करत अति, कपै परत गनि। श्री हरिदासी संग विलास, कुंज केलि अपनी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (105)