स्यामा नित्य बिहार बनी

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 14 of 35

(राग विहागरौ) मेरी कुंजबिहारिन रानी। कुंजबिहारी हरषि लडावत, अंग - अंग छबि बानी॥ [1] आनंद कोक कला गुन गूढनि, छोरि ग्रंथ रस सानी। रसिक रूप नित्य कुंजबहारिन, लालहि अति सुखदानी॥ [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (578) (राग विहागरौ) मेरी कुंजबिहारिन रानी। कुंजबिहारी हरषि लड़ावत, अंग-अंग छबि बानी।।[1] आनंद कोक कला गुन गुधानी, छोरी ग्रंथ रस सानी। रसिक रूप नित्य कुंजबहारिन, ललाही अति सुखदानी.. [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस छंद (578)
मैं जानी मैं जानी लडैती जूश्री वृंदावन चंद बिहारी