मैं जानी मैं जानी लडैती जू

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 20 of 35

सहज बिहार निरन्तर मेरौ। तन मन मिलि विहरत दोउ प्रीतम, छिन छिन प्रेम घनेरौ॥ [1] जीवन प्रान सुकेलि हमारी, दास बिहारिन कियों निबेरौ। सदा प्रसन्न ललित हरिदासी, कोउ दहिनों रहौ कि डेरौ॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (103) सहज बिहार, सतत मेरु। मेरा शरीर और मन एक साथ हैं, मेरा प्यार तुमसे है, मेरा प्यार तुमसे है। सदा सुखी ललित हरिदासी, जो दाहिनी ओर बसी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, शृंगार रस के छंद (103)
मैं जानी मैं जानी लडैती जूमैं जानी मैं जानी लडैती जू