मैं जानी मैं जानी लडैती जू
Shringar Ras Ke Pada —
Verse 21 of 35
श्री कुंजबिहारिनी सब सुखकारी।
सदा सर्वदा इक रस राजें, अंग संग प्रीतम प्यारी॥ [1]
महा रूप रस पान करत हैं, छिन छिन चाह अपारी।
श्री हरिदासी लाड लड़ावत, तन मन ह्वै बलिहारी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (65)
श्री कुंजबिहारिणी सर्व सुखाय। एक ही स्वाद सदा राज करता है, हर अंग को सबसे प्रिय। [1] रस के महान रूप के भोक्ता, छिन-छिन च अपारि। श्री हरिदासी लड़ै, तन मन बलिहारी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस छंद (65)