मैं जानी मैं जानी लडैती जू
Shringar Ras Ke Pada —
Verse 24 of 35
सुख रासि हमारी प्यारी जू।
अति आनन्द भरी रस माती, रोम रोम हितकारी जू॥ [1]
छिन छिन प्रीति नई नई उपजति, जीवनि जीय जियारी जू।
श्री ललितकिसोरी के हित विहरत, छिन हूँ होत न न्यारी जू॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (15)
सुख रासी हमारी प्यारी जू। अत्यंत आनंददायक रस मति, रोम-रोम के लिए हितकारी। [1] छिन-छिन प्रीति न नै उपजति, जिवनि जिया जियारि जू। श्री ललित किशोरी की रुचि न्यारी है, छिन हुन होता न यारी जू.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस छंद (15)