मैं जानी मैं जानी लडैती जू

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 27 of 35

तो सी तुही मेरी प्रान पियारी। तन मन मिलैं मिल्यौई भावै छिन हू कबहूँ होत न न्यारी॥ [1] महा रूप रस पान करत हैं तऊ तृपति न होत बिहारी। परम कृपाल रसिकवर नागरी क्यों न होहु हरिदास दुलारी॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (71) तो तुम मेरे प्रिय हो. तन-मन कब मिलेंगे, मेरा भविष्य न बिछुड़ेगा.. [1] यदि तुमने महारूप का रस पिया होता, तो तुम त्रिपाठी या बिहारी न होते। मैं परम धन्य रसिकवर नागरिक क्यों न होऊं, हरिदास दुलारी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (71)
स्यामा तू करुना को सागरविहरत विपिन भरत रंग ढुरकी