विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी
Shringar Ras Ke Pada —
Verse 28 of 35
(राग बसन्त)
विहरत विपिन भरत रंग ढुरकी।
हरषि गुलाल उडाइ लाडिली, सम्पति कुसमाकरकी॥ [1]
कसुंभी सारी सोधें भीनी, ऊपर बंदन भुरकी।
चोली नील ललित अञ्चल चल, झलक उजागर उरकी॥ [2]
मृदुल सुहास तरल दृग कुंडल, मुख अलकावलि रुरकी।
श्रीनागरीदासि केलि सुख सनि रही, मैंन ललक नहिं मुरकी॥ [3]
- श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (48)
(राग बसंत) विहारत विपिन भरत रंग धुराकी। हरषि गुलाल उदय लाडिली, सम्पति कुसमाकार्की..[1] सारे होंठ गीले हो गए, ऊपर का बंदन भीग गया। ब्लाउज नीला है, महीन आँचल हिल रहा है, उरकी में झलक दिख रही है। [2] शीतल सुगंध द्रव्य है, कुंडल द्रव्य है, मुख अलकावली रूरकी है। श्री नागरीदासी को न सुख मिलता है न दया। [3] - श्री नागरी देव जी, श्री नागरी देव जू की वाणी, शृंगार रस के पद (48)