आजु सखी आये मेह सुहाये

Shringar Ras Ke Pada —

Verse 4 of 35

प्रीति की रीति रंगीलीये जानें। लिये रहत हित नित्य ललित कौं तन मन धन इनही कौं माने॥ [1] तैसीये ललित महा सुख दैंनीं अद्भुत रूप रँग रस सानें। और न इन्हें सुहाय रसिक कौं आनंद केलि सहज ही आनें॥ [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस के पद (37) प्रेम की परंपरा का जन्म रिंगली होना चाहिए। दैनिक जीवन में किसे रुचि है? जो तन, मन और धन में विश्वास रखता है.. [1] इतना सुंदर, महान सुख, अद्भुत सौंदर्य, रंग और स्वाद हर दिन। और एन इने सुहाय रसिक कौन आनंद केलि सहज ही अनेन.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, श्रृंगार रस की वाणी (37)
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