नामी नाम न भावई
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 1 of 102
आदि अंत वृन्दाविपिन, निरदोषिक करि बास।
अद्भुत सुखद बिहार कों, देत तिन्हें हरिदास॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (440)
वृन्दाविपिन, आदि से अन्त तक निष्पाप कर्म ही करो। अद्भुत सुखद बिहार कौन दे, तीन हरिदास.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत साखी (440)