कुंदन रतन भूमि लता तरु रही झूमि

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 102 of 102

(कवित्त) कुंदन रतन भूमि, लता तरु रही झूमि, सरस परस होत जमुना के पानी कौ। [1] ललित ललित अति छवि पर बलि बलि, राग रंग अंग-संग सुख रजधानी कौ॥ [2] प्रकट प्रकास रास केलि कौन कहि सकै, थकी मति सुरन की, देव बुधि बानी कौ। [3] वृंदावन धाम अभिराम सदा स्यामास्याम, महकै सुगंध सौं महल महारानी कौ॥ [4] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के कवित्त एवं सवैया (28) (कविता) कुन्दन रतन भूमि, लता वृक्ष झूल रहे हैं, जमुना का जल गरम हो रहा है। [1] सुन्दर, सुन्दर, अति सुन्दर छवि की राजधानी कौन है, सुख की राजधानी कौन है? [2] प्रकट प्रकाश के लिए ही कौन कह सका, मौन का थका हुआ मन, जो दिव्य बुद्धि बन गया। [3] वृन्दावन धाम अभिराम, सदा श्याम सुवासित, सौ महल रानी के.. [4] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत की कविता, एवन सवैया (28)
उद्धव आदि ब्रह्मादिक दुर्लभ