प्रेम-सार, सुख-सार है, रूप-सार रस-सार।

Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव

Verse 44 of 102

प्रेम-सार, सुख-सार है, रूप-सार रस-सार। श्रीललितकिसोरी प्रान है, निरवधि नित्य विहार॥ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत की साखी (170) प्रेम सार है, खुशी सार है, सौंदर्य सार है। श्री ललित किशोरी जीवन हैं, निरंतर यात्रा करती रहती हैं.. - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव चिड़ियाघर की आवाज, सिद्धांत के मित्र (170)
प्राप्ति में संसै नहीं, तन मन वचननि एक।नामी नाम न भावई