श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 83 of 102
नित्य विहार अखंड है, ता निजु धर्महि मानि।
औतार कथा है जहाँ लौ, सो उपधर्महि जानि॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (78)
नित्य विहार अखण्ड, ता निजु धर्महि मणि। जहाँ ज्वाला है, वहीं अवतार कथा है, वहीं ज्ञान है.. - श्री रूप साखी, सिद्धांत के दोहे (78)