श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 84 of 102
रंगमहल निधिवन सदा, निरखत केलि सुरास।
रसिक अनन्यनि को तिलक, श्री स्वामी हरिदास॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (9)
रंगमहल निधिवन सदा, निरखत केलि सुरस। रसिक अनन्यानी श्री स्वामी हरिदास जी को तिलक.. - श्री रूप सखी सिद्धांत के दोहे (9)