श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि
Siddhant Ki Sakhi — श्री ललित किशोरी देव
Verse 98 of 102
श्री हरिदास अनन्य जै, वर विहार-रस केलि।
दंपति रति गति माधुरी, राखी नैंननि झेलि॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (26)
श्री हरिदास अन्य जय, वर विहार-रस केलि। धनपति रति गति माधुरी, राखी नैननानि झेलि.. - श्री रूप सखी सिद्धांत के दोहे (26)