(कवित्त)
Siddhanta Pada —
Verse 1 of 63
(कवित्त)
अब हीं बनी है बात, औसर समझि घात,
तऊ न खिसात, बार सौक समझायो है। [1]
आजु काल्हि जैहैं मरि, काल-व्याल हूँ ते डरि,
भौंडे भजन ही करि कैसो संग पायो है॥ [2]
चित-वित इत देहु सुखहि समझि लेहु
‘सरस’ गुरुनि ग्रन्थ पन्थ यौं बतायो है। [3]
चरन सरन भय हरन, करन सुख,
तरन संसार कों तू मानस बनायो है॥ [4]
- श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)
(कविता) अब मामला तो साफ़ हो गया है, बाकी समझ तो साफ़ नहीं है, लेकिन समस्या तो साफ़ हो गई है। [1]. [3] सरन सरन भय हरण, करण सुख, तरण संसार तूने मेरा मन कौन बनाया.. [4] - श्री सरस देव जी, श्री सरस देव जी के वचन, सिद्धांत के सिद्धांत (20)