अब जिन करो अबार लड़ैती जू, मोरी नवरिया अटकी।

Siddhanta Pada —

Verse 2 of 63

अब जिन करो अबार लड़ैती जू, मोरी नवरिया अटकी। मो सौ अधम उधारन तो सो, दोऊ ओर नहीं घटकी॥ [1] विषय लागि तब भजन न जानौं हौं अधमन कुल राइ। राई सम नहीं गनत मेरु अघ, तुम करुनाकर सुखदाइ॥ [2] या भवसिंन्धु अगाध तरणि तरि, तेरौ ही नाम विराजै। श्रीललिता नाव खेवटिया जाको, आनि सकल लखि लाजै॥ [3] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (30) अब तुम चाहे कुछ भी करो, फिर लड़ोगे, लेकिन कभी नहीं फँसोगे। मो सौ अधम उधारन तो सो, दोउ या नहीं फटाली.. [1] बात शुरू हो तो भजन न जानौं हूं अधम कुल रै। मेरे अनुमान में कोई तुलना नहीं है, आगा, आप एक दयालु दिलासा देने वाले हैं। [2] हे प्रभु, सिंधु सागर और तारों में डूबे हुए, आपका नाम मुझमें बसता है। श्री ललिता नव खेवतिया जाको, अनी सकल लखि लाजै.. [3] - श्री वंशी अली, छंद के सिद्धांत (30)
(कवित्त)बैठत उठत चलत, श्रीकुंजबिहारी की जिकरि।