पौंढे माई लालन गिरिवरधारी

Siddhanta Pada —

Verse 14 of 63

(राग विहागरो) होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली आई। अबीर गुलाल लिएँ नैननि में, आजु करत मन भाई॥ [1] बाजे बजत दुहुँ दिसि नीके, मनमथ मोद बढ़ाई। छबि तरंग छूटत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई॥ [2] गावत गीत रस-रीति जीति के, पुलकि किलकि सुखदाई। श्रीरसिकबिहारिनि की छवि निरखत, ज्यों दामिनि घन छाई॥ [3] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (21) (राग विहगरो) होरी खेलनि स्याम हुलसि छबीली ऐ। अबीर गुलाल लीं नैनी में, आजु करत मन भाई.. [1] बाजे बजत दुहूँ दिसि नइके, मन्मथ मोद बधाई। छबि तरंग छूत पिचकारी, भृकुटिन मार मचाई.. [2] गावत गीत रस-रीती जीती के, पुलकी किलकि सुखदाई। श्री रसिक बिहारिणी की छवि दामिनी के घन के समान अविनाशी है.. [3] - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी के वचन, सिद्धांत (21)
हिंडोरे झूलत री सुरंग चूनरी पहिरेंकुंज महल रंग हो हो होरी