कुंज महल रंग हो हो होरी
Siddhanta Pada —
Verse 15 of 63
(राग गौरी)
हमारे धन वृन्दावन प्यारी।
खरचत खात घटै नहिं कबहूँ बाढत छिन छिन अति अधिकारी॥ [1]
ताही कौ अभिमान सदाई ताही बल बस कुंज बिहारी।
श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि प्रान प्रान मिलि कीनी यारी॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (159)
(राग गौरी) हमारा धन वृन्दावन प्रिय। खाट का दाम कभी कम नहीं होता, जितना बड़ा छीनने वाला, उतना बड़ा अधिकारी... [1] इसलिए सदा रहता है अभिमान, वही है कुंजबिहारी। श्री हरिदासी रसिक सिरोमनि प्राण प्राण मिलि किनि यारी.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत पद (159)