(सवैया)

Siddhanta Pada —

Verse 32 of 63

(सवैया) लोक वेद मरजाद गहैं न लहै, सुख आपु कलंक कुसंग निवासी। [1] बैठत ऑनि अनन्यन के आसन, दासन प्रेम प्रसंग उदासी॥ [2] साहिब सेवक रीति न जानैं, क्यौं मानैं महासठ बुद्धि विनासी। [3] ह्याँ सुद्ध अनन्य बसें वन वृन्द, खरिकु खरो खोटौ लोग लिवासी॥ [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (16) (सवैया) लोक वेद मरजद गेहें न लहै, सुख आपु कलंक कुसंग निवासी। [1] अनन्या की सीट पर ओनी बैठा है, उसका प्रेम प्रसंग दुखदायी है.. [2] साहेब सेवक रीति न नैन, क्यूं मैनीं महसथ बुद्धि विंसी। [3] ह्यं शुद्ध आय बसेण वन वृंद, खरिकु खरहो खोतौ लोग लिवासी.. [4] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी के वचन, सिद्धांत के श्लोक (16)
ललिता बिनु क्यों राधा पैयेयै।मेरे प्रान जीवन धन राधे।