आज सखि निरख रूप भरि नैन
Siddhanta Pada —
Verse 34 of 63
(राग विहागरौ)
मेरे संत चरण रज अंजन।
तीन ताप अरु तिमिर नसावै, काम क्रोध दल गंजन॥ [1]
सदा अमित आनंद बढावै, भाल तिलक उर मंजन।
जुगल-केलि बन की दरसावै, रूपसखी मन रंजन॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (99)
(राग विहगरौ) मेरे संत चरण राज अंजन। तीन तप - अंधकार, नासिका, काम और क्रोध, हुंकार। [1] अमित आनंद सदा बढ़ाओ, भाल तिलक उर मंजन। जुगला-केलि बन की दरसवै, रूप सखी मन रंजन.. [2] - श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत श्लोक (99)