मो निर्धन की ललिता संपति।
Siddhanta Pada —
Verse 35 of 63
मो निर्धन की ललिता संपति।
छिन न सकत बिसराय जीय ते, मोहि लटकि लागत पल झँपति॥ [1]
जाय निरखि प्यारी गद-गद ह्वै, अंक लगनि पुलकित तन कंपति।
जय श्री वंशी अलि श्री राधा बलि नित प्रति चाहत नित चरनन कों चंपति॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (34)
मो निर्धन की ललिता स्नैपती. जीते जी छीनना मत भूलो, मोहि लताकि लगत पल झनपति।।[1] जय श्री वंशी अली श्री राधा बाली नित प्रति चाहत नित चरणन कोण चनापति.. [2] - श्री वंशी अली, सिद्धांत के छंद (34)