प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है।
Siddhanta Pada —
Verse 43 of 63
प्रिया जू की चितवनि प्रेम की सुधारी है।
चितवत चित हरें, प्रानन आनंद करें, ताही रंग भरें, आली देह सुधि हारी है॥ [1]
लपटि महा रस बेली, ललित सुखद झेली, विवस बिहार बढ्यौ रूप एक सारी है।
नवल निकुंज दोउ, जानत न कौन कोउ, दासी हरि सावधान रीझि रीझि वारी है॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (121)
प्रेम के विषय में प्रिया जू की चेतावनी से सुधार हुआ। चितावत चित हरेन, प्राणान आनंद करेन, ताहि रंग भरेन, अली देह सुधि हरि है.. [1] लपति महा रस बेलि, ललित सुखद झेलि, विवस बिहार बध्यौ रूप एक साड़ी है। नवल निकुंज दोउ, जांत न कौन कोऊ, दासि हरि सावधान रीझी रीझी वारी है.. [2] - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (121)