(सवैया)
Siddhanta Pada —
Verse 46 of 63
(सवैया)
राखि हृदै प्रिय प्रेम सुधा-रस, सार दुराइ दिखावत बूर।
करि विषै तन माया प्रपंच, कृपा बिनु वस्तु लहै क्यों मूर॥ [1]
श्रीगुरु प्रेम प्रसन्न बसे बन, धर्म अनन्य महा मन सूर।
श्रीनागरिदास को दै सुख संग, श्रीबिहारीनि जानि परयो गर कूर॥ [2]
- श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (18)
(सवैया) राखी हृदय प्रिय प्रेम सुधा-रसा, श्री दुरई बुरा रूप। करि विषय शरीर माया प्रपंच, कृपा बिनु वास्तु लहै क्यों मुआर.. [1] श्रीगुरु प्रेम प्रसन्न आधार बान, धर्म आए महा मन सूर। श्री नागरीदास सुख करो, श्री बिहारिणी जानि परायो गर कुर.. [2] - श्री नागरीदेव जी, श्री नागरीदेव जी के वचन, सिद्धांत (18)