श्री वृन्दावन रानी साहिबनी।

Siddhanta Pada —

Verse 59 of 63

श्री वृन्दावन रानी साहिबनी। स्वामिनी चरन कमल की सेवा, हमको भली ठनी॥ [1] ललितादिक सखियन सों मित्रता, हौंहू तो या पात गनी। जुगल रसिक रस जय श्री बंसीअलि, जानत क्योंहू ना मुख जात भनी॥ [2] - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (14) श्री वृन्दावन रानी साहिबानी। मेरी पत्नी के चरण कमलों की सेवा ही हमारे लिए सर्वोत्तम स्थान है.. [1] ललितादिक मित्र, पुत्र मित्रता, हौन्हु तो या पाट गनि। जुगल रसिक रस जय श्री बंसाली, जानत क्यूंहु न मुख जात भानी.. [2] - श्री वंशी अली, छंद सिद्धांत (14)
सोई रहै महा आनंद में एक लाडिली जाहि राखै ।सुनो जी कानैं नूपूररो झनकार।