गौर देत नित सर्व सुख श्याम रूप ह्वै लेत
Sudharm Bodhini — श्री लाड़लीदास
Verse 3 of 5
गौर श्याम रस सिन्धु में, केलि तरंग अपार।
गाई गावत गाय हैं, रसिकू सुयश विस्तार॥
- श्री लाड़लीदास, सुधर्म बोधिनी (4.37)
गौर श्याम रस सिन्धु पुरुष, केलि तरंग अपार। गै गावत गे हैं, रसिकु सुयश विस्तार.. - श्री लाडलीदास, सुधर्मा बोधिनी (4.37)