हों इन मोरन की बलिहारी

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 1 of 92

(राग मल्हार) आज वन उमगि रही वृजनारी। फूली फिरत निशंक गुन गावत, झूलत प्रान पियारी॥ [1] एक कुसुम लाई डारत ऊपर, एक चितनत रही ठाड़ो। एक जो आय धाय मोहन पर, अन्क भरत है गाढी॥ [2] नील पीत अंग-अंग विराजत, और श्रृंगार सिंगरे। 'सूर' संग विलसत है भामिनि, नेकहु होत न न्यारै॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर (राग मल्हारा) अज वन उमागी रहि व्रजनारी। निर्भय गीतों से भरा है गीत, मेरे प्रियतम का झूलता जीवन.. [1] एक फूल भय सहता है, दूसरा चिंता में रहता है। जो हे धाय मोहन पर है, अंक भारत का उपवन है.. [2] नील हृदय कण-कण में समाया है, शृंगार से सजाता है। भाभी 'सूर' के पास विलास है, दया नहीं... [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति