हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 2 of 92

अब मेरैं निज ध्यान यह, रहौं जूठ नित खाइ। और बिधाता कीजियै, मैं नहिं छाँड़ौ पाइ॥ - श्री सूरदास, सूर सागर अब मेरा व्यक्तिगत ध्यान हर दिन यहां रहने पर है। और कृपया मुझे बताएं, मैं कवि नहीं हूं.. - श्री सूरदास, सूर सागर
हों इन मोरन की बलिहारीबलि बलि हौं कुँवरि राधिका