मन रे श्याम सों कर हेत
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 34 of 92
(राग विहाग)
नवल किशोर नवल नागरियाँ।
अपनी भुजा श्याम भुज ऊपर श्याम भुजा अपने उर धरियाँ॥ [1]
क्रीडा करत तमाल तरुन तर श्यामा श्याम उमॅगि रस भरियाँ।
यों लपटाइ रहे उर उर ज्यों मरकत मणि कंचन में जरियाँ॥ [2]
उपमा काहि देउँको लायक मन्मथ कोटि वारने करियाँ।
सूरदास बलि बलि जोरी पर नंदकुँवर वृषभानु दुलरियाँ॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
(राग विहागा) नवल किशोर नवल नागरियाँ। अपनी भुज श्याम भुज ऊपर श्याम भुज अपनी उर धारियाँ.. [1] तमल तरूण तरूण खेलत श्याम श्याम उमेगी रस भरियाँ। पन्ने में मोती की तरह मेरी बांहों में लिपटा हुआ.. [2] क्या मैं तुम्हें ऐसी उपमा दे सकता हूं जो लाखों आशीर्वादों के योग्य हो। सूरदास बाली बाली जोरी पर नंदकुंवर वृषभानु दुलरियन.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर