हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 35 of 92

निसिदिन बरसत नैन हमारे। सदा रहत पावस ऋतु हम पर, जबते स्याम सिधारे॥ [1] अंजन थिर न रहत अँखियन में, कर कपोल भये कारे। कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहुँ, उर बिच बहत पनारे॥ [2] आँसू सलिल भये पग थाके, बहे जात सित तारे। 'सूरदास' अब डूबत है ब्रज, काहे न लेत उबारे॥ [3] - श्री सूरदास, सूर सागर हमारी आंखों के सामने हर दिन बारिश होती है। शाम होते ही बारिश का मौसम मंडराने लगता है। [1] अंजन की दृष्टि स्थिर नहीं रहती, वह भयभीत हो जाता है। जब मेरा मन अपनी चूत में भरने का नहीं करता तो मैं ढेर सारे आँसू मुँह में फैला लेती हूँ.. [2] जब मेरे कदम थक जाते हैं तो आँसू बहने लगते हैं। 'सूरदास' का ब्रज अब डूब रहा है, उसके उबरने तक इंतजार क्यों न किया जाए.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर
मन रे श्याम सों कर हेतफूल्यो री सघन वन तामे