स्याम भये बस नागरि कैं
Sur Sagar — श्री सूरदास
Verse 55 of 92
(राग भैरव)
स्याम भये बस नागरि कैं।
नैन कटाच्छ बंक अवलोकनि, रीझे घोष उजागरि कैं॥ [1]
चित मधुकर, रस कमल-कोस कौ, प्यारी बदन सुधागरि कौं।
लोक-लाज-संपुट नहिं छूटत, फिरि-फिरि आवत वागरि कौं॥ [2]
मिलन प्रकास मनावत मन-मन, कहा कहौं अनुरागरि कौं।
'सूर' स्याम बस-बाम भये हैं, धन ऐसी बड़भागरि कौं॥ [3]
- श्री सूरदास, सूर सागर
(राग भैरव) स्याम भये बस नगरी कैन। नैन कच्छ तट अवलोकन, रिज घोष उजगारी कैन। [1] चित मधुकर कौन, रस कमला-कोस, प्यारी बदन सुधागरी कौन। लोक-लाज-संपुट मिटता नहीं, जो बार-बार आता है... [2] मन में संघ जप की ज्योति, किसको कहूं उपासक? 'सूर' स्याम तो बस बम है, जो धन का इतना अभिमान.. [3] - श्री सूरदास, सूर सागर