हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीति

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 54 of 92

सुनि परमित पिय प्रेम की, चातक चितवति पारि। घन आशा सब दुख सहै, अंत न याँचै वारि॥ - श्री सूरदास, सूर सागर सुनो प्रेम परम प्रेम, उज्जवल चेतावनी देवदूत। धन आशा सब दुख सहे, अंत न होय.. - श्री सूरदास, सूर सागर
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिस्याम भये बस नागरि कैं