तज मन हरि विमुखन को संग

Sur Sagar — श्री सूरदास

Verse 57 of 92

(राग बिलावल) तज मन हरि विमुखन को संग। जिनके संग कुमति उपजत है, परत भजन में भंग॥ [1] कहा होत पय पान कराए विष, नहिं तजत भुजंग। कागहि कहा कपूर चुगाये, स्वान न्हवाऐ गंग॥ [2] स्वर को कहा अरगजा लेपन, मरकट भूपन अंग। गज को कहा सरित अन्हवाऐ, बहुरि धरै वह ढंग॥ [3] पाहन पतित बान नहिं बेधत, रीतो करौ निषंग। 'सूरदास' कारी काँमरि पे चढ़त न दूजौ रंग॥ [4] - श्री सूरदास जी, सूर सागर, वीनय तथा भक्ति (44) (राग बिलावाला) तज पुरुष सह हरि विमुखम्। जिससे कुमति उत्पन्न होती है, परत भजन में घुल जाती है.. [1] विष कहावै तजत भुजंग नाहिं। कागजी कहा कपूर चुगाए, सावन नहावै एनजी.. [2] स्वर को कहा अरगजा लेपन, मरकत भूपन अंग। आंगन से कहा, सरित अन्हावै, बहुरि धरै वा धंग.. [3] पाहन पतित बन नहिं बेधत, रीतो करो निषंग। 'सूरदास' दासी को रंग मत लगाओ.. [4] - श्री सूरदास जी, सूर सागर, विनय और भक्ति (44)
हम अहीरि कह जानईं जोग जुगुति की रीतिराधे तेरौ बदन बिराजत नीकौ